देहरादून, 04 नवंबर। उत्तराखंड की पूर्वी दून घाटी की प्रमुख नदी सोंग के पारिस्थितिक स्वास्थ्य का आकलन करने के लिए स्प्रिंग एंड रिवर रिजुविनेशन अथॉरिटी (सारा) ने जैविक संकेतक (बायोइंडिकेटर) परियोजना के तहत शोध शुरू किया है। इसके जरिए नदी के जल की गुणवत्ता, जलीय जीवों, नदी तट के पर्यावास और मानवीय गतिविधियों के प्रभाव का अध्ययन किया जाएगा।
प्रदेश सरकार के एक प्रवक्ता ने बुधवार को बताया कि भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के पूर्व वरिष्ठ प्राध्यापक एवं वैज्ञानिक ‘जी’ डॉ.वीपी उनियाल के मार्गदर्शन में होने वाले इस अध्ययन में पांच प्रमुख जीव समूहों को जैविक संकेतक के रूप में शामिल किया गया है। इनमें जलीय मैक्रोइनवर्टेब्रेट्स, तितलियां, जंगली मधुमक्खियां, ड्रैगनफ्लाई, डेम्सलफ्लाई और पक्षियों की प्रजातियां शामिल हैं।
अध्ययन के तहत कीटों और उनके लार्वा की मौजूदगी से जल प्रदूषण की स्थिति का आकलन किया जाएगा, जबकि तितलियों और जंगली मधुमक्खियों से नदी तट की वनस्पति एवं परागण की स्थिति का पता लगाया जाएगा। ड्रैगनफ्लाई और डेम्सलफ्लाई की प्रजातियां जलीय पर्यावरण तथा पक्षियों की विविधता नदी घाटी के समग्र पारिस्थितिक स्वास्थ्य के संकेत देंगी।
परियोजना के तहत सोंग नदी के उद्गम स्थल कद्दूखाल (टिहरी) से गंगा में संगम स्थल टिहरी फार्म (देहरादून) तक करीब 80 किलोमीटर क्षेत्र का सर्वेक्षण किया जाएगा। इसके लिए नदी को ऊपरी, मध्य और निचले तीन क्षेत्रों में बांटकर प्रत्येक में 12 स्थायी नमूना केंद्र बनाए गए हैं। इस तरह कुल 36 स्थानों पर अध्ययन होगा।
नवंबर से अप्रैल के बीच छह महीने तक चलने वाले इस अध्ययन में मानसून के बाद और मानसून से पहले दो चरणों में नमूने एकत्र किए जाएंगे। इससे नदी के जैविक स्वास्थ्य का आधारभूत आंकड़ा तैयार होगा।
इस अध्ययन से प्रस्तावित सोंग बांध परियोजना, खनन और शहरीकरण जैसी गतिविधियों के नदी की पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करने में मदद मिलने की उम्मीद है। इसके निष्कर्षों के आधार पर नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए योजनाएं और नीतियां तैयार की जा सकेंगी।