नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने रविवार को 1984 के सिख विरोधी दंगों में मारे गए निर्दोष सिखों की स्मृति और पीड़ित परिवारों के साथ एकजुटता व्यक्त करने के लिए दिल्ली में पदयात्रा निकाली गई। हरिनगर डिपो से तिलक नगर मेट्रो स्टेशन तक आयोजित इस पदयात्रा के दौरान दिल्ली के पर्यावरण मंत्री और वरिष्ठ सिख नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा कि 01 नवंबर 1984 भारतीय इतिहास का वह काला अध्याय है, जिसे देश कभी नहीं भूल सकता। 1984 के सिख विरोधी नरसंहार में हजारों परिवारों के चिराग बुझा दिए गए और 42 साल बाद भी पीड़ित परिवारों के जख्म ताजा हैं। ऐसे संवेदनशील दिन पर राहुल गांधी और कांग्रेस द्वारा रामलीला मैदान में रैली आयोजित करना सिख समाज की भावनाओं के प्रति असंवेदनशीलता है।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की दुहाई देने वाली कांग्रेस को पहले 1984 के पीड़ितों के न्याय और अपने इतिहास से जुड़े सवालों का जवाब देना चाहिए। ऐसे दिन कांग्रेस पार्टी द्वारा दिल्ली में राजनीतिक रैली आयोजित करने के फैसले ने सिख समाज की भावनाओं और पीड़ित परिवारों के जख्मों को फिर से सामने ला दिया है।
सिरसा ने कहा कि 42 वर्ष पहले जिन परिवारों ने अपने पिता, पति, बेटे और भाई खोए, वे आज भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसलिए आज हम राजनीति से ऊपर उठकर पीड़ित परिवारों के साथ खड़े हैं। उन्होंने कहा कि 1984 के मामलों में लंबे समय तक न्याय की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने सत्ता में आने के बाद इन मामलों को दोबारा गंभीरता से उठाया। दिसंबर 2014 में केंद्र सरकार ने 1984 दंगों में मारे गए लोगों के परिजनों के लिए प्रति मृतक 5 लाख रुपये की अतिरिक्त सहायता को मंजूरी दी और पीड़ितों की शिकायतों की समीक्षा के लिए न्यायमूर्ति जीपी माथुर समिति गठित की।
इसके बाद फरवरी 2015 में केंद्र सरकार ने बंद हो चुके गंभीर मामलों की पुनः जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया। सिरसा ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा उठाए गए इन कदमों का उद्देश्य लंबे समय से लंबित न्याय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना भी था। उन्होंने कहा कि आज जो लोग लोकतंत्र और इंसाफ की बात कर रहे हैं, उन्हें यह भी बताना चाहिए कि 1984 के पीड़ितों के लिए उनकी सरकारों ने क्या किया। नरेंद्र मोदी की सरकार ने पीड़ित परिवारों की शिकायतों को दोबारा सुना, अतिरिक्त मुआवजा दिया और बंद मामलों की जांच के लिए एसआईटी बनाई। न्याय की यह प्रक्रिया आज भी महत्वपूर्ण है।
सिरसा ने रकाब गंज गुरुद्वारा हिंसा का उल्लेख करते हुए कहा कि 1 नवंबर 1984 को वहां दो सिखों की हत्या हुई थी और इस मामले से जुड़े तथ्यों की जांच को लेकर वे स्वयं न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले में कांग्रेस नेता कमलनाथ की कथित भूमिका को लेकर अलग-अलग जांच और गवाहों के बयान सामने आए हैं, जबकि कमलनाथ ने आरोपों से इनकार किया है। 2019 में गृह मंत्रालय की एसआईटी ने 1984 से जुड़े सात मामलों को फिर से जांच के लिए लिया था, जिनमें रकाब गंज से संबंधित मामला भी शामिल था।
सिरसा ने झारखंड के कांग्रेस नेता एवं मंत्री द्वारा दिल्ली में 10 हजार समर्थकों के साथ आकर मुख्य निर्वाचन आयुक्त को कथित रूप से “उठाकर रांची ले जाने” संबंधी बयान पर भी सवाल उठाया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अंसारी ने यह बयान 1 नवंबर के विपक्षी प्रदर्शन के दौरान दिया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में किसी संवैधानिक संस्था के प्रमुख को भीड़ तंत्र के बल पर उठाकर ले जाने की भाषा स्वीकार नहीं की जा सकती। विरोध और प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार हैं, लेकिन कानून-व्यवस्था और संविधान की मर्यादा बनाए रखना हर राजनीतिक दल की जिम्मेदारी है।
सिरसा ने कहा कि 1984 के पीड़ित परिवारों की पीड़ा और उनके न्याय की प्रतीक्षा किसी भी राजनीतिक आयोजन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि आज की पदयात्रा 1984 में जान गंवाने वाले निर्दोष लोगों को श्रद्धांजलि देने, पीड़ित परिवारों के साथ एकजुटता व्यक्त करने और न्याय की आवाज को बुलंद करने का संकल्प है। हम सुनिश्चित करेंगे कि पीड़ितों की आवाज अनसुनी न रहे और उन्हें न्याय दिलाने की लड़ाई पूरी मजबूती से जारी रहे। उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार और भाजपा नेतृत्व सिख समाज के साथ खड़ा है और 1984 के पीड़ित परिवारों के सम्मान, न्याय और अधिकारों के लिए संवैधानिक एवं कानूनी माध्यमों से अपनी आवाज उठाता रहेगा